गाँव के एक झोपड़ी में रात के अंधेरे में दीया फिर
भी जलता था — छोटी लड़की ने पाठ्यपुस्तक के कोने
को उतारकर चाँद की किरणों से पढ़ना शुरू किया। दसव
ीं के बाद जाति के नियम ने उसके नाम को तालिका से
मिटा दिया था: "अवर्ण नाम के बच्चे को स्कूल में प
्रवेश नहीं।"
आठवीं की डिग्री मिलने पर गाँव ने त्योहार के दिन
उसे सार्वजनिक रूप से गाँव के मंदिर के बाहर खड़ा
कर दिया — एक जाति के दर्शन के लिए। उसके पास अब ब
स एक चारपाई की ओर देखने का हक था। दूर से दूरदर्श
न की आवाज़ आई — विश्व क्रिकेट चैंपियनशिप के फाइन
ल की घोषणा। उसकी आँखों में आग जली।
उस रात जब गाँव ने उसे त्योहार के आग में जलाने का
फैसला किया, उसके पिता ने अपनी दस साल पुरानी एम्
ब्रॉयडरी की चिट्ठी निकाली — जिस पर लिखा था: "मेर
े बेटे को डिग्री देने का अधिकार जाति से नहीं, बल
्कि देश से है।" वह रात उसके लिए अंतिम अवसर थी।
उसने दूरदर्शन के लिए बाहर निकलकर लाइन में खड़ा ह
ो गया — एक रेट्रो मॉडल का टीवी जिसे दस साल से चल
ाने की आशा नहीं थी। अचानक वह दीये के लम्हे में ब
रसात आई, लेकिन टीवी जला रहा था। बच्चे की आँखों म
ें दिखी उसकी डिग्री की तस्वीर — अब गाँव के मंदिर
के दरवाज़े पर लगी थी, जिस पर लिखा था: "इस बच्चे
के लिए जाति नहीं, शिक्षा है आदर्श।"
दूरदर्शन के स्क्रीन पर भारत ने विश्व क्रिकेट चैं
पियनशिप जीत ली थी। लड़की की आँखों में आंसू नहीं,
बल्कि चाँद की रोशनी थी। गाँव ने अब उसके नाम को
फिर से लिख दिया था — नए अक्षरों में, नए त्योहार
में।


