1946 की बर्फीली शाम, लाहौर के एक छोटे घर की छत प
र राजू खड़ा है। उसके दाहिने हाथ में एक पुराना रे
डियो का टुकड़ा, जिसमें गांधीजी की आखिरी भाषण की
रिकॉर्डिंग बंद हो चुकी है। वह जानता है: अगर वह आ
ज छत से उतरा तो उसके गांव के सात लोगों को अब तक
बचाने का कोई रास्ता नहीं बचेगा।
उसके पिता की लाश अभी तक लाहौर में गुम है। उसकी म
ाँ ने आज तक अपने घर की ओर देखा नहीं, क्योंकि उसक
े घर की दीवारों पर लिखा था—"हिंदू लाइन"
;। राजू को
आशा नहीं बची थी। वह बैठा रहता था एक टूटी बाल्टी
के ऊपर, जहाँ उसके दाहिने हाथ में एक नया नाम लिख
ा गया था—"सुनील"। यह नाम उसके पिता द्व
ारा बनाया
गया था, जो कि एक ऐतिहासिक नियम के अंतर्गत वाध्य
था: अगर कोई व्यक्ति अपने परिवार के नाम को छोड़कर
नया नाम लेता है, तो उसके परिवार के बचे लोगों को
काल्पनिक दुनिया में जीवित रखने का अधिकार मिलता
है—लेकिन नाम बदलने वाले को जीवित रहने का अधिकार
नहीं होता।
राजू ने अपने दाहिने हाथ को छत के किनारे से झांका
। लेकिन उसके हाथ में चिपका नाम "सुनील"
बदल गया—अ
ब यह लिखा था: "इंदिरा"। वह नहीं जानता
था कि यह ब
दलाव कैसे हुआ। लेकिन उसके पीछे एक बूढ़ा आदमी खड़
ा था, जिसकी आँखों में आग थी। वह उसके पिता के भाई
थे, जिन्होंने खुद के नाम को बदल दिया था ताकि उन
के भाई के बच्चे बच सकें। उन्होंने कहा था: "जीवन
एक नाम नहीं, एक वादा है।"
राजू ने अपने हाथ को वापस छत पर रख दिया। वह उतरा।
वह घर में गया। वहाँ माँ ने उसे देखा, और आँखों म
ें आंसू नहीं बहे—बल्कि एक छोटी सी मुस्कान आई। उस
ने कहा नहीं, लेकिन उसके हाथ में एक छोटा लाल फीता
था—उसकी बहन के लिए जो अभी भी जीवित थी, लेकिन अब
उसे जानने का अधिकार नहीं था।
उसी रात, एक लाल बल्लेबाज ने लाहौर के ट्रेन स्टेश
न पर एक क्रिकेट की गेंद फेंकी—और उसके पीछे देश क
ी रेखा बदल गई। राजू के दाहिने हाथ में नाम अब "सु
नील" था—लेकिन उसके दिल में बस एक बात रह गई: जीवन
उसके नाम से नहीं, उसके विश्वास से लिखा जाता है।


