1976 के दिसंबर में, एक छोटे गाँव के लिए अपनी बेट
ी के लिए ब्राह्मण आदर्श की भेंट करने वाला युवा ल
ेखक, राजू, अपनी गाँव की दो लाइनों के नाम से शहर
में आता है — एक जगह जहाँ सारे लोग डाक्टर, इंजीनि
यर और अधिकारी बनने के लिए लड़ते हैं। गाँव में उस
का अपना नाम नहीं, लेकिन शहर में वह अपनी लिखावट क
े लिए अलग होना चाहता है।
उसका घर अब एक छोटी लैटर बॉक्स वाली झुग्गी में है
, जहाँ दूरदर्शन के टीवी की ध्वनि से बचने के लिए
दरवाज़े बंद रहते हैं। उसके दिन बड़े दर्शनीय तथ्य
ों से भरे हैं: एक अखबार के आखिरी पेज पर लिखी एक
छोटी कहानी उसके लिए बिल्कुल नई दुनिया खोल देती ह
ै। लेकिन उसकी लिखावट को कोई नहीं देखता — कोई भी
उसके लेख को "अनुपयुक्त" कहता है क्योंक
ि उसमें ब्
राह्मण आदर्श के बाहर कुछ लिखा है।
एक दिन, उसके लिखे एक अनुभवपरक लेख को एक नामी पत्
रकार ने छापा — लेकिन उसके नाम के बजाय एक अनाम आद
मी का नाम लगाया गया। उस रात राजू के घर में अचानक
दूरदर्शन बंद हो जाता है, और अगले दिन उसके दोस्त
ने बताया कि उसके लिखे लेखों को अब वहाँ छापने की
अनुमति नहीं है — "सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता
है"
।
उसी दिन उसकी माँ ने उसे एक बात बताई: "हमारे गाँव
में तुम्हारा नाम तो नहीं था, लेकिन तुम्हारी आवा
ज़ थी। वही आवाज़ शहर में भी नहीं बोल सकती?"
राजू ने अपने लिखे लेखों को एक ठंडे दिन तक बॉक्स
में रखा, फिर उसे अपने गाँव के एक बाबा के पास भेज
दिया — वहाँ उसके लिखे लेख गाँव के स्कूल में पढ़
े जाने लगे। जब गाँव के बच्चों ने उसके लेख पढ़े,
तो उनकी आँखें चमक उठीं — एक लड़के ने कहा, "ये तो
हमारे बाप की कहानी है!"
उसी रात, राजू के शहर के कमरे में दूरदर्शन फिर से
चल गया। उसकी लिखावट अब अखबार में छापी जाने लगी
— लेकिन इस बार उसका नाम साफ लिखा गया। और उसके लि
खे लेख अब किसी दूसरे आदमी के नाम से नहीं, बल्कि
अपने नाम से छापे जाने लगे।
उसके लिए शिक्षा अब नहीं बल्कि लिखने का जुनून बन
गया — एक ऐसा अधिकार जो दबाने के नियमों के बावजूद
बच गया। आखिरी लाइन में उसने लिखा: "अगर मैं नहीं
बोला, तो कौन बोलेगा? और अगर नहीं लिखा, तो कौन य
ाद करेगा?"
वह आज भी लिखता है — एक छोटे से बॉक्स में, जहाँ द
ूरदर्शन की ध्वनि आती है, लेकिन अब उसकी आवाज़ भी
आती है।


