1978 की सुबह, नौ बजे का दूरदर्शन स्क्रीन पर गांध

ीजी का चेहरा डूब रहा था। दराज़ में छिपा एक घड़ी

बजी — वह उसी तारीख के लिए टाइम बिंदु थी जिसे महि

ला ने अपने दिमाग में बंद कर दिया था। उसके घर में

तीन लोग रहते थे: उसका पति, एक बेटा, और उसकी माँ

जो दो साल पहले तृतीय अवस्था में अपनी बेटी के ना

म से मर गई थी। उसका नाम राधा था — लेकिन उसके परि

वार ने उसे "आशा" कहना शुरू कर दिया था।

उस दिन, दूरदर्शन के नाटक में एक आवाज़ आई — एक बच

्चे की आवाज़ जो कह रही थी: "माँ, मैं तुम्हें नही

ं भूलता।" महिला की आंखें भर आईं। वह जानती थी कि

वह बच्चा उसका नहीं था। लेकिन उसके दिल में एक धुं

धली याद जगी — 1947 की रात, जब वह अपने बच्चे को त

लाश करती थी, और अपनी दादी के घर के बाहर बच्चे के

लिए एक छोटा गुलाब रख गई थी। उस रात के बाद उसका

बच्चा गायब हो गया था — और उसने कभी उसका नाम नहीं

बताया।

अगले दिन, पति ने उसे एक पत्र दिया — जिसमें लिखा

था: "आशा के लिए तुम्हारी तीसरी बार आपातकालीन व्य

वस्था विवाह की शर्तें बदल रही हैं। तुम्हें अब अप

ने बच्चे को वापस लेने के लिए जाति का बीज खोलना ह

ोगा।" उस पत्र में एक छोटा टैग लगा था: &quot

;विशेष अधि

कारी ने निर्णय लिया है: जो माँ अपने बच्चे को खो

देती है, वह फिर से उसे नहीं पहचान सकती।"

उस दिन, उसने अपने घर के बाहर जाति के बीज के बीच

एक गुलाब रखा — वही गुलाब जो 1947 में रखा था। दूर

दर्शन की टीवी आवाज़ में आवाज़ आई: "आज से आत्मखोज

वाले परिवारों के लिए एक नई शर्त: अगर माँ बच्चे

को नहीं पहचानती, तो बच्चा भी उसे नहीं पहचानेगा।"

रात में, उसके घर में एक आवाज़ आई — एक बच्चे की आ

वाज़ जो उसके नाम को बुला रही थी। वह खड़ी हो गई,

बिना लैंप जलाए, और दराज़ से वह घड़ी निकाली जो 19

47 में रुकी थी। घड़ी की स्पीड बढ़ गई — और उसके द

िमाग में एक झलक आई: उसका बच्चा उसे छू रहा था, उस

के हाथ में गुलाब लिए हुए। उसने आखिरी बार अपने बच

्चे का नाम बोला — "राधा" — और उसके दिल

में एक ता

कत जगी।

अगली सुबह, दूरदर्शन के चैनल पर एक नया नाटक शुरू

हुआ — जिसमें एक माँ अपने बच्चे को देखती थी, लेकि

न वह उसे नहीं पहचानती थी। उस माँ के चेहरे पर डर

नहीं था — बल्कि एक गहरी समझ थी। और उसके घर में,

एक गुलाब अब फिर से रखा गया था — लेकिन इस बार उसक

े नाम के लिए, न कि खोए हुए बच्चे के लिए।

इस पीस का अंत यही था: आत्मखोज नहीं बच्चे को ढूंढ

ना था — बल्कि खुद को वापस लेना था। और वह लौट आई

तो बस एक अपने माँ के रूप में, जिसके बच्चे को वह

नहीं भूली थी — बल्कि उसके नाम के लिए जीती थी।