उस गली के अंत में एक टूटी हुई लाइटबल्ब के नीचे,
एक लेखक ने अपनी बैठक तैयार की — दीवार पर चिपचिपी
धूल में लिखे शब्दों के बीच एक नक्शा खींचा। उसके
हाथ में एक पुरानी फिल्म की टिकट, जिसमें दिनांक
15 अगस्त 1947 लिखी थी — नहीं, यह नहीं थी आज की त
ारीख, बल्कि विभाजन के दिन की एक घटना का रिकॉर्ड।
उस दिन से देश के नक्शे में एक नई स्थिरता आ गई थ
ी — जिसने अब तक के सभी बैंक, अखबार, फिल्म घरों क
ो दो भागों में बाँट दिया था। जहाँ पहले सिनेमा एक
राष्ट्रीय भाषा थी, अब वह एक आपत्ति बन गई — नए र
ाज्यों के अधिकारी ने फिल्मों में अपने भाषास्थान
के नाम लगाने का नियम बना दिया था। कोई भी फिल्म ब
नाने वाला बिना अनुमति के अपने नाम के आगे देश का
नाम लगा सकता था — नहीं, वह नाम अब अपने विभाजन के
नियम के अनुसार लिखा जाता था।
लेखक के घर में एक नाम लिखा था: “अमृत सिंह” — जो
न केवल उसका नाम था, बल्कि उसकी शिक्षा का आधार भी
। वह पढ़ाई में अच्छा था, लेकिन विभाजन के बाद उसक
े घर के लिए वह पढ़ाई अब एक अपराध बन गई थी — क्यो
ंकि उसके बाप ने एक अंग्रेजी अखबार में लिखा था: “
सभी भारतीयों को एक ही देश में रहना चाहिए,” और उस
के नाम को एक संघर्ष के रूप में अब लिखा जाने लगा
था। उसने अपनी ताकत के रूप में लिखावट को बनाया —
अपने हाथ से फिल्म के स्क्रिप्ट लिखना, एक दर्शक क
े तरीके से जीवन को देखना। लेकिन जब उसने एक फिल्म
के लिए अपना नाम “इंडियन फिल्म नेटवर्क” में दर्ज
करने की कोशिश की, तो उसका नाम एक नए राज्य के ना
म के साथ लगा दिया गया — “पंजाब इंडियन फिल्म”। उस
ने आवेदन वापस ले लिया।
फिर एक रात, उसने अपनी नाम के लिए एक नई ताकत खोजी
— वह फिल्म की एक तस्वीर में अपना नाम लिखा, लेकि
न नहीं, वह नाम उसके देश के नाम में नहीं बल्कि उस
की आंखों में लिखा गया — जहाँ एक बच्चा बारिश में
खेलता था, और उसके पीछे एक फिल्म का बैनर था: “हम
सभी भारतीय हैं”。
उसने इस तस्वीर को लिखा, फिर उसे एक पुराने बैंक क
े बैक डॉर से निकाला और अपने घर में लगा दिया। वह
तस्वीर अब एक नए नियम के बजाय एक विद्रोह के रूप म
ें दिखती थी — क्योंकि उस पर लिखा था: “नाम का अधि
कार नहीं, लेकिन शिक्षा का अधिकार है।”
अगले दिन, उसके घर के बाहर एक फिल्म का पोस्टर लगा
— जिस पर उसका नाम लिखा था, लेकिन नहीं, वह नाम उ
सके नाम के बजाय एक नए फिल्म के नाम के रूप में लि
खा गया था — “अमृत की तस्वीर”。
उसने देखा — फिल्म बनाने के लिए नाम नहीं, बल्कि व
िचार की जरूरत थी। उसने अपने बैग में वह तस्वीर रख
ी, और उस दिन अपने लेखन को एक नए रूप में लिखा — न
हीं, वह अब फिल्म नहीं बना रहा था, बल्कि एक ऐसी क
हानी लिख रहा था जो लोगों को याद दिलाती थी कि शिक
्षा के बाद भी वे एक दूसरे के नाम के लिए लड़ सकते
हैं।
और उस रात, उसने अपनी तस्वीर को एक नए नाम के साथ
लिखा — “अमृत सिंह: शिक्षा का अधिकार, फिल्म का ना
म नहीं” — और उसे एक छोटे तालाब के किनारे फेंक दि
या। वह तस्वीर बह गई — लेकिन उसकी छाया अब देश के
हर बच्चे की आंख में थी।


