1945 के अंत में, उत्तरी पंजाब के एक छोटे गाँव मे
ं चारबार बारिश के बाद भी खेत झुलसे रहते थे। वहाँ
की जमीन के अंदर एक अज्ञात ताकत रहती थी — जमीन ध
ीरेधीरे लहराती और दूर तक तनाव फैलाती। गाँव के लो
ग इसे 'प्राचीन भूमि' कहते, लेकिन वे जा
नते नहीं क
ि यह कभी जीवित थी।
एक दिन, गाँव के घरेलू नौकर रामचंद्र को उसके मालि
क के घर में एक छोटी सी लकड़ी की डाली मिली, जिस प
र जर्जर लिखा था: "अगले त्योहार में देश के नाम पर
जलाओ बल्कि खाओ नहीं"। उसके बाद उसके आईने में अप
नी छाया ने बात की — जैसे कोई और था। रामचंद्र ने
आत्महत्या की धमकी दी, लेकिन वह अपनी छाया के बारे
में नहीं बोलता था।
त्योहार के दिन, गाँव में दो तरह के लोग थे: वे जो
बाहरी सीमा के लिए तैयार थे, और वे जो अपने घरों
में दीवार बनाने लगे थे। रामचंद्र ने अपनी छाया को
अपने पीछे खड़ा कर लिया। उसके हाथ में एक बर्तन थ
ा — जिसमें अंगूर का रस था, लेकिन वह रस जमीन में
गिरते ही जल उठता था।
दूसरे दिन, एक बूढ़ा आदमी गाँव में आया, जिसके बाल
जैसे आग के धुएँ से लिखे गए थे। वह कहा: "इस त्यो
हार में जो अपने छाया को नहीं मानता, उसके घर में
जमीन दो बार उखड़ जाती है।" रामचंद्र ने अपनी छाया
को बुलाया। छाया ने अपने चेहरे के बाएँ हिस्से को
छुआ — और गाँव के एक घर की दीवार तेजी से टूट गई।
वह रात, त्योहार के अंत में, गाँव के बाहरी किनारे
पर एक बड़ा आग का ढेर जल रहा था। रामचंद्र ने अपन
ी छाया को बुलाया, और उसने अपने अंदर की जमीन को ख
ोल दिया। अंदर से एक अजीब आवाज आई — नहीं, यह आवाज
नहीं थी, बल्कि एक देश की याद थी।
गाँव वाले अब जान गए कि जमीन में बसा था वही देश ज
िसे उन्होंने 1947 में छोड़ा था — नहीं, वह तो अब
लौट आया था, लेकिन उसके अंदर आग जल रही थी। रामचंद
्र ने अपनी छाया को देश के नाम पर बल्कि खाए नहीं
— उसके बाद वह अपने घर में चला गया, और उसके दरवाज
े पर एक बर्तन रखा था — जिसमें अब अंगूर का रस नही
ं था, बल्कि रक्त था।
उस रात से, गाँव के लोग अपने घरों में अपनी छाया क
ो देखते थे। और जब कोई उसे नहीं मानता, तो जमीन दो
बार उखड़ जाती थी।


