1923, राजकोट के गाँव में धूल भरी दीवारों के पीछे
एक प्राचीन मंदिर के खंडहर में बालक शंकर के लिए
एक नाम लिखा गया था — नहीं, लिखा गया था, बल्कि चु
नाव के लिए डाला गया था। गाँव की व्यवस्था में नाम
एक जाति के आधार पर लगाया जाता था: जिस बालक के न
ाम के आगे "शंकर" लिखा जाता था, वह उसी
तरह जाति क
े स्मारक में दफन होता था — नहीं, बल्कि उसकी अस्थ
ि वहाँ रखी जाती थी। इस सिस्टम में जाति का नाम एक
विधि थी, जो जीवन के बाद भी अपने वास्तविक नाम को
घेरे रखती थी।
1945, एक महिला छात्र अपने गाँव के पुराने ग्रंथाल
य में खुद के नाम को ढूंढ रही थी — नहीं, वह अपने
पिता के नाम की तलाश में थी। उसका नाम "सुमन&
quot; था,
लेकिन उसकी जाति के नियमों के अनुसार, वह "शं
कर" न
हीं थी — वह अपने बचपन के नाम को छुपाए हुए थी। उस
ने एक लाल बॉक्स में एक खुला लिफाफा पाया — अपने प
िता के बचपन का पत्र, जिसमें लिखा था: "तुम्हारी म
ाँ ने मुझे नाम नहीं दिया, लेकिन उसने मुझे जीवित
रखा।"
उस पत्र में एक गुप्त प्रेम संबंध का जिक्र था — ए
क ब्राह्मण लड़के और एक सामान्य गाँव की लड़की के
बीच का जो रिश्ता जाति के आइने में टूट गया था। पि
ता को उस लड़की के नाम के बाद "शंकर" लि
खने की अनु
मति नहीं दी गई थी — लेकिन उसके मामले में, उसकी म
ाँ ने अपने पति के लिए एक नाम बना दिया था: उसके न
ाम के आगे लिखा गया था — "शंकर", लेकिन
उसकी माँ क
े नाम के बाद लिखा गया था — "सुमन"।
अगले दिन, गाँव के सभी लोग एक अनौपचारिक बैठक में
इकट्ठा हुए। वह महिला छात्र अपने नाम को उसी तरह ल
िखने लगी जैसे उसके पिता ने किया था — लेकिन इस बा
र नाम उसके बाद लिखा गया था — "सुमन"। उ
सके पास एक
लाल लिफाफा था, जिसमें लिखा था: "जाति के नाम के
बाद लिखा गया नाम, वही असली नाम है।"
उस दिन से, गाँव में नाम लिखने का तरीका बदल गया —
अब जाति के बाद लिखा जाता था, लेकिन उसके नाम के
आगे अपने प्रेम के नाम को लिखा जाता था। वह उदास थ
ी, लेकिन उसके चेहरे पर एक नया शांति थी — जैसे एक
ऐतिहासिक गलती के बाद अपनी माँ के नाम का अंतिम अ
धिकार लौटा लिया गया हो।
कोई ने उसे नहीं बोला, लेकिन सभी ने देखा — एक नाम
के तहत, एक जाति के खंडहर में, एक महिला छात्र ने
अपने सम्मान के लिए अपने नाम का अंतिम रूप लिखा थ
ा।


