1947 के विभाजन के बाद, गाँव कलाहली के नाम का नक्
शा बदल गया। एक ओर भारत, दूसरी ओर पाकिस्तान — और
गाँव की धरती आधीआधी बँट गई। एक दिन, महिला बाबू क
े खाते में एक डॉक्यूमेंट आया: उसकी माँ की तरफ से
दावा, लेकिन गाँव का नाम अब अपनी जगह नहीं रख सकत
ा — वह अब पाकिस्तान में है।
इसके बाद गाँव में कोई नहीं जानता था कि इस जमीन क
ा मालिक कौन है। कोई रजिस्ट्री नहीं थी, कोई नाम न
हीं जो अभी भी जीवित हो। सिर्फ एक झोंपड़ी बची थी,
जिसके बाहर लटका था एक चित्र: महिला बाबू की माँ,
जिसे 1938 में छात्र आंदोलन में बलपूर्वक खींचा ग
या था। उसके बाद कोई नहीं जानता था कि वह कहाँ गई।
उस चित्र के नीचे लिखा था: "मेरी जमीन का नाम नहीं
बदला जा सकता।"
2002 में, एक नागरिक लौटा — एनआरआई अमित राय, जो द
ो दशक से लंदन में रहा। उसकी माँ की आखिरी डायरी म
ें लिखा था: "अगर तुम आओ, तो इस जमीन को वापस ले ल
ेना। नहीं तो वह अब किसी की नहीं होगी।"
वह आया तो गाँव में बाबू के घर के खंडहर में एक पत
्ती देखी — जिस पर लिखा था: "हम लोग यहाँ नहीं हैं
, लेकिन हमारा नाम जीवित है।"
गाँव के लोग उसे नहीं मानते थे। वह अपनी जमीन के ल
िए कागजात लेकर आया था, लेकिन वहाँ कोई नाम नहीं थ
ा। तब उसने अपने लिए एक नियम बनाया: अगर कोई गाँव
के बच्चे अपनी माँ के नाम से नाम रखे, तो उसे जमीन
का अधिकार मिलेगा।
एक दिन, एक छोटी लड़की ने अपने नाम में "महिला बाब
ू" जोड़ दिया। गाँव के लोग उसे डांटते थे — &
quot;तुम व
ह नहीं हो जो गायब हो गई थी!"
लेकिन उस रात, एक अजीब आवाज आई: धरती के नीचे से आ
वाज आई — जैसे कोई बोल रही हो। लोगों ने देखा कि झ
ोंपड़ी के बाहर चित्र फिर से चमक रहा था — और उसके
नीचे लिखा था: "मेरी जमीन अब किसी की नहीं है, ले
किन मेरा नाम तुम्हारे बच्चों में है।"
अगले दिन, गाँव के बच्चों ने अपने नाम में "महिला
बाबू" जोड़ लिया। एक दिन में, सारे नाम बदल गए। गा
ँव के नाम का नक्शा फिर से बन गया — लेकिन इस बार
वह अब पाकिस्तान के नाम में नहीं था।
अमित राय ने एक नोट छोड़ा: "मैं लौटा था, लेकिन वह
जमीन मेरी नहीं थी। वह जमीन तो अब गाँव के बच्चों
के नाम में थी।"
उसकी डायरी में एक आखिरी लाइन थी: "विदेश से लौटा
हूँ, लेकिन वापस आया नहीं। मैं तो बस इतना जानना च
ाहता था कि क्या एक नाम भी जीवित रह सकता है?"
और गाँव के बच्चे अब एक दूसरे को कहते थे: "तुम्हा
री माँ का नाम महिला बाबू है?"
अब उस नाम का अर्थ नहीं था — लेकिन उसकी आवाज थी।


