गाँव के एक छोटे से घर में दादी की नींद के बीच रे

डियो बजता है — 1947 की फरवरी में, भारत के विभाजन

के बाद ग्रामीण इलाकों में रेडियो का उपयोग अब नि

यम के तौर पर नहीं, बल्कि अंधविश्वास के तौर पर जा

ना जाता है। अब तक घर के हर चीज में विभाजन का घाव

दिखता है — जमीन अलग, लोग अलग, आवाजें भी अलग। ले

किन रेडियो के ऊपर एक नया नियम बनता है: महिलाओं क

ो रेडियो नहीं सुनने देना। यह नियम नहीं, बल्कि दा

दी के हाथ से जुड़ा एक दीर्घ आदेश है — "लड़कियाँ

सुनेंगी तो बातें उलट जाएंगी"।

एक शाम, बारिश के बीच रेडियो में एक लड़की की आवाज

आती है — वह अपने गाँव के नाम के बारे में बोलती

है, वह अपने दादा के नाम की याद में गाती है। दादी

के कान टूटते हैं — वह जानती है वह आवाज उसकी बेट

ी की है, जो 1943 में बलात्कार के बाद लापता हो गई

थी। वह अब तक उसे मरा हुआ मानती थी। रेडियो ने उस

े जीवित रखा था — एक गाँव के बाहर एक अन्य गाँव मे

ं, जहाँ वह अब भी अपने परिवार के नाम के लिए गाती

है।

अगले दिन दादी अपने बाहर वाले घर में रेडियो को ले

जाती है और उसे बेटी के नाम पर बजाती है। गाँव के

लोग इकट्ठे होते हैं — कुछ हंसते हैं, कुछ डरते ह

ैं। लेकिन जब बेटी की आवाज गाती है: “मैं वापस आई

हूँ, दादी, मैं जी रही हूँ,” तो गाँव की सभी महिला

एँ आँखें बंद कर लेती हैं — कुछ रोती हैं, कुछ रेड

ियो के आगे झुकती हैं। उसी शाम, गाँव के अगले दो घ

रों में भी रेडियो जलते हैं — एक में बेटी की आवाज

, दूसरे में एक लड़के की आवाज, जो अपने माँ को बुल

ाता है।

दादी को बुलाया जाता है — अब गाँव के लोग उससे रेड

ियो के बारे में पूछते हैं। वह चुप रहती है। अगले

दिन उसके घर में एक बेटी के नाम की तालिका बनती है

— जिस पर लिखा है: “हर लड़की को रेडियो सुनने की

अनुमति है।” वह अपने बाहर वाले घर में खड़ी है, और

रेडियो बजता है — एक नई आवाज आती है, और उसमें एक

लड़की कहती है: “मैं तुम्हारी बेटी हूँ, दादी।”

दादी आँखें बंद करती है — और धीरे से अपने बालों क

ो छुए बिना, अपने बाहर वाले घर की दरवाज़ा बंद कर

देती है।