ऊंचे शिखर पर एक मंदिर खड़ा है, जहां दिनरात धूप ल
गती रहती है। इस मंदिर के पुजारी रामनाथ छोटे घर क
े बच्चे थे, जिन्हें पढ़ाई के बजाय धार्मिक रीतिरि
वाजों में डुबोया गया था। उनकी जाति के नियमों के
कारण वे आधुनिक शिक्षा तक पहुंच नहीं सके।
एक दिन, एक बाहरी शिक्षक आया, जिसने रामनाथ के दिम
ाग को जगाया। वह उन्हें पढ़ाने लगा, जिससे उनके भी
तर एक अनुश्रवण जग उठा। जाति के नियमों के खिलाफ ए
क झगड़ा शुरू हो गया, जिसमें रामनाथ के परिवार ने
उन्हें घर से निकाल दिया।
रामनाथ एक छोटे से गांव में ठहर गए, जहां उन्होंने
एक छोटा स्कूल खोला। लोग उन्हें अपने जाति के बंध
नों के बाहर देखकर भयभीत रहे, लेकिन जब उन्होंने ब
च्चों को पढ़ाया, तो उनका विश्वास बढ़ा।
एक दिन, एक लड़की ने रामनाथ के पास आकर कहा, "मैं
भी पढ़ूंगी, बावजूद अपनी जाति के।" इस वचन ने रामन
ाथ के दिल में एक नई उमंग जगाई।
उन्होंने अपने स्कूल को बड़ा करने के लिए एक बैंक
के ऋण के लिए आवेदन किया, लेकिन उनकी जाति के कारण
अनुमति नहीं मिली। इस बाधा के बावजूद, रामनाथ ने
एक छोटे से निर्माण कार्य शुरू किया, जिसमें बच्चो
ं ने सहायता की।
अंत में, एक दिन रामनाथ के स्कूल ने एक विश्वविद्य
ालय के साथ एक समझौता किया, जिससे उनके बच्चों के
भविष्य का रास्ता खुल गया। रामनाथ ने अपने जीवन के
अंतिम दिनों में एक अंतिम अंतर्द्वंद्व छोड़ दिया
, जो उनकी जाति के नियमों के बाहर जीवन जीने के लि
ए एक नई दिशा देता रहा।
उदास और गहरा, उनकी कहानी एक शिक्षा और सफलता के ल
िए जाति के बंधनों के ऊपर चढ़ने की एक यादगार गाथा
बन गई।


