1946 की दीवाली में लखनऊ के एक तिजोरी में ड्रमगान

ा बजता था — एक दीवाने के घर में, जहाँ त्योहार का

नियम था: हर साल एक बेटी को गाँव भेजकर बच्चे के

नाम से त्योहार का बलिदान देना। यह रीति नाम के सा

थ लंबे सालों से चली आई थी — बच्चे का नाम तय करके

उसके आत्मा को देश के भागदौड़ की आग में लगाना। इ

से "पौराणिक पुनर्कथन" कहा जाता था, जहा

ँ बच्चे के

नाम के बदले देश के नाम का आशीर्वाद बाँटा जाता थ

ा।

उस साल फूलों के दो बालक थे — एक लड़का, एक लड़की।

लड़की का नाम रही निहारिका। वह घर में सबसे छोटी,

लेकिन उसके आंखों में ऐतिहासिक बातें झलकती थीं —

वह गाँव के दीवारों पर लिखी शिकायतों को पढ़ती, ज

हाँ लोगों के नाम छुपे थे, जैसे उन्हें अब भी याद

रखना निषेध था।

अगले साल, आग आई। लखनऊ में अफगानी तख्तों के आधार

पर अलगअलग घरों में जाति के बारे में लिखे गए नाम

गायब हो गए। त्योहार का नियम टूट गया — अब न लड़की

गाँव भेजी जाती, न नाम लिखे जाते। घर के आदमी, एक

शहरी व्यापारी, ने बंद कर दिया त्योहार का बोर्ड

— अब यह एक बोझ था, न कि रीति।

निहारिका को अपनी बहन की शादी के दिन एक बालिका का

नाम देखने को मिला — वही नाम जो उसके बचपन में गा

ँव भेजे जाने वाले बच्चे का था। उस नाम के बाद लिख

ा था: “इसके बाद नाम लिखना बंद।” वह दीवार पर खड़ी

रह गई। आखिरी बार त्योहार में नाम लिखे गए थे, और

आखिरी बार एक महिला का नाम लिया गया था — उसका ना

म।

वह रात भर बैठी रही। आखिरी दीवाली के दिन, उसने अप

ने नाम के बदले एक नया नाम लिखा — “स्वतंत्रता की

धूल”। उसके बाद उसने अपने घर के दीवार पर बोर्ड उत

ार दिया, और दीवाली के बाद घर के तीन दरवाजे बंद क

र दिए। उस रात, लखनऊ में एक भारी बारिश हुई — जैसे

देश ने आखिरी बार रोया था।

कभी नहीं बताया गया कि वह लड़की कौन थी। लेकिन अगल

े साल गाँव के एक बूढ़े आदमी ने एक तिजोरी से निकल

े नामों को लिखा: “निहारिका — आखिरी जो लिखा गया।”

उसके बाद नाम नहीं लिखे गए।

त्योहार अब एक आशीर्वाद नहीं, बल्कि एक बात था — ज

ो अब कभी नहीं लिखी जाएगी।