1947 की जून की रात, लाहौर के निशान में आग लगी। ए

क ब्राह्मण गुरु, जिसका नाम अजय था, ने अपने गाँव

के लोगों को छोड़कर विभाजन की लहर में भागने का फै

सला किया। लेकिन उसकी आत्मा बांधकर नहीं गई — वह ब

ाहर फंस गई, एक नागरिकता के बिना, अपने देश के एक

ओर खड़ी।

उसका आत्मा का अवशेष एक गाँव में बस गया, जहाँ उसक

े नाम का एक चौक था — लेकिन कोई उसकी कथा नहीं जान

ता था। गाँव वालों ने उसे अपने लोक देवता के रूप म

ें स्वीकार कर लिया, लेकिन उनकी आस्था में एक नियम

बिठा था: जो भी उसके चौक पर ताबीज लगाएगा, वह अपन

े घर के बाहर नहीं जा सकेगा। यह नियम कानून नहीं थ

ा — बल्कि एक दैवी भय था।

एक युवा पुरुष, राजू, जिसके गाँव में एक ब्राह्मण

कुलीन और एक मुस्लिम गांव के बीच सदियों से तनाव थ

ा, अपनी बहन के लिए एक बाजार में लौट आया। उसके हा

थ में एक छोटा बाल था, जो उसकी नानी ने उसे बाँटा

था — बाल जिसे उसके घर के बाहर रखने का आदेश था। ल

ेकिन उसने उसे गुरु के चौक पर रख दिया।

आधी रात, चौक के बीच में आग लग गई। नहीं, आग नहीं

— एक अनुभूति उठी। जैसे कोई धूप जाग उठी हो। गाँव

के लोगों को लगा कि गुरु अब अपने आत्मा के नियमों

से ऊपर उठ रहे हैं। राजू के घर में एक ब्राह्मण मं

दिर का दर्शन दिखा — जो कभी नहीं बना था। एक नाम ल

िखा गया था दीवार पर: अजय गुरु, आज तुम्हारा देश भ

ी तुम्हारे नाम पर बस रहा है।

अगले दिन, गाँव में दो तरफ के लोग मिले। एक ब्राह्

मण और एक मुस्लिम ने एक साथ काली बाली लगाई गुरु क

े चौक पर। उस दिन से वह चौक एक नया गाँव का दिल बन

गया। अब जो कोई भी वहाँ जाता, वह अपने दुख को छोड

़कर वापस लौटता — न कि डरकर।

आशा ने एक नई आकृति ले ली थी: नहीं बचाव की भावना,

बल्कि एक नया अनुभव। अब गाँव में एक ऐसा बच्चा था

जिसका नाम अजय था — और वह अपने दादा के नाम पर एक

गुरु के रूप में जी रहा था।