1947 की गर्मी में दिल्ली के एक अनाथालय के टॉयलेट

में एक लड़के का नाम लिखा गया — "विजय चौधरी&

quot; — ल

ेकिन वह नाम कभी बचा नहीं। उसके बाद एक नाम की बात

चीत शुरू हुई: जिसके नाम को बचाने के लिए कोई जीवि

त नहीं था, वह अपने नाम को दूसरों के जीवन में बचा

ने की चाह लिए रह गया।

उस दिन से देश में एक अजीब व्यवस्था बन गई — जिसमे

ं जो व्यक्ति अपने नाम को खो देता था, उसके नाम की

अवधारणा भी अदृश्य हो जाती थी। जिसका नाम लिखा नह

ीं गया, वह ऐतिहासिक तौर पर अनमान्य था। अगर कोई उ

सके नाम को बारबार बोलता, तो उसके बुरे दिन आने लग

ते। नाम लेना एक अपराध बन गया — अब तक नाम बचाने क

े लिए लोग एक दूसरे के नाम के बारे में झूठ बोलते

थे।

विजय चौधरी को याद था एक बात — उसके बाप ने कहा था

, "नाम तो बचता है, जब धार्मिक आस्था में विश्वास

हो।" वह एक महत्वाकांक्षी छात्र था, जिसे इतिहास क

े अंग्रेजी प्रश्नपत्रों में भी नाम नहीं दिखता था

। उसने अपने नाम को एक डायरी में लिखा, फिर उसे एक

जातीय मंदिर में छिपा दिया — जहाँ लोग बारबार नाम

को बोलते थे, लेकिन उसका नाम अब तक न लिखा गया था

एक दिन, एक रात में दिल्ली के सिनेमा घर में एक फि

ल्म चल रही थी — "स्वतंत्रता के तीन दिन&quot

;। उसमें ए

क दृश्य में एक लड़का नाम के बारे में बोलता था —

"मेरा नाम विजय है।" स्क्रीन पर वह नाम

लिखा नहीं

गया, लेकिन दर्शकों के दिलों में वह जाग उठा। मीडि

या ने उस दृश्य को ब्लॉक कर दिया, लेकिन एक बार लि

खा गया नाम कभी मिट नहीं सकता।

अगले दिन, एक लड़की ने अपने नाम को बचाने के लिए ए

क चार्टर बोला — "मेरा नाम विजय है।" उस

की आवाज़ र

ेडियो में आई, फिर टेलीविजन में, फिर एक स्कूल के

बोर्ड पर लिखा गया। देश में लोग नाम लेने लगे — धा

र्मिक आस्था के तारे जगमगाए।

कुछ दिनों बाद, एक अखबार ने लिखा: "एक नाम के बिना

जीवित लड़के को देश ने अपने आखिरी नाम के तारे से

जोड़ लिया है।" उसी दिन, दिल्ली के एक गांव में,

एक बुढ़ा आदमी ने अपने बचपन के नाम को बचाने के लि

ए अपने गांव के मंदिर में एक लाल बत्ती जलाई — और

उस रात उसके नाम का जादू खुल गया।

अब नाम बच गए हैं। लेकिन वह शांति अब तक नहीं आई —

क्योंकि जब तक लोग नाम को बचाने के लिए आस्था नही

ं लेते, तब तक नाम का तारा बुझ जाता है।