1947 के अगस्त में एक छोटे गांव में धूल भरी रेल ल

ाइन पर एक ट्रेन खड़ी है। जमीन सूखी है, घरों के द

रवाजे बंद हैं, लेकिन चारों ओर बालबाल लगे नामों क

े चिह्न अभी भी झलकते हैं — 'गोलू', &#0

39;अमर', 'सुनीत

ा'। इस दुनिया का नियम बदल गया: जहां कभी परिवार क

े नाम पर जीवन जुड़ता था, अब उसी नाम के लिए लोग अ

पनी जाति बदल रहे हैं। गांव के सबसे बड़े घर में छ

ात्र राजू अपनी लाइब्रेरी के दरवाजे पर बैठा है, ब

िना किसी शादी के जीवन की योजना बना रहा है — लेकि

न उसके अंदर एक छात्र जैसे नाम के अधिकार का भय बै

ठा है।

उस दिन रात को गांव के बाहर एक रेलवे स्टेशन पर एक

लड़की उतरती है — उसका नाम नहीं बताया गया, लेकिन

उसके बैग में लिखा है: "विवाह निर्णय 1923&q

uot;. गां

व के पंचायत के अध्यक्ष ने उसके नाम के बाहर उसके

दादा के बच्चे के नाम पर विवाह तय कर दिया था — और

अब वह एक अनाथ लड़की के रूप में आई है। व्यवस्था

विवाह का नियम अब लागू है: जिस नाम पर लड़की का वि

वाह तय किया गया हो, वही उसका नाम है — चाहे वह उस

के आत्मा का नाम हो या न हो।

राजू के घर में उसके दादा की छात्रावस्था के दौर क

ी तस्वीरें लगी हैं — एक क्रिकेट बल्ले के साथ, जो

उसके दादा के बल्लेबाज़ी के दौर की याद दिलाती है

। लेकिन उस बल्ले पर एक नाम खुदा है: 'अर्जुन

'. रा

जू ने अब तक नहीं पूछा कि वह नाम कहां से आया। अब

जब वह लड़की के बैग को देखता है, तो उसकी आंखें ठं

डी हो जाती हैं — वही नाम, वही लिखावट।

व्यवस्था विवाह का नियम एक दिन में बदलता है: अब व

ह लड़की को उसके दादा के घर वापस भेजने की जरूरत न

हीं है — बल्कि उसे उसके नाम के लिए विवाह करना है

। और राजू के दादा के नाम पर उसका विवाह तय हो गया

है। उसके दादा के नाम के बाहर लड़की का विवाह तय

हो गया है — और वह अब एक आत्मा के रूप में लौट आई

है।

गांव के मैदान में एक क्रिकेट मैच खेला जाता है —

जहां अब तक के लोग एक दूसरे को नहीं जानते थे। राज

ू अपने दादा के बल्ले से खेलता है। उसके हाथ में ब

ल्ला है, लेकिन उसके दिल में एक पुरानी याद है — ए

क बार उसके दादा ने कहा था: “मैं नहीं चाहता था कि

मेरा नाम किसी और के जीवन के बल्ले के रूप में चल

े।”

मैच के आखिरी ओवर में, राजू ने बल्ला ऊपर उठाया। त

भी लड़की आगे आई और उसके हाथ में एक तस्वीर लिए हु

ए। वह एक तस्वीर थी — राजू के दादा के बच्चे के सा

थ, जो कभी जीवित नहीं रहा था। उस तस्वीर में लड़की

के दादा के नाम के बाहर लिखा था: “मैं तुम्हारी ज

ाति नहीं चाहता, मैं तुम्हारा नाम चाहती हूं।”

राजू ने अपने बल्ले को जमीन पर रख दिया। उसके आंखो

ं में आंसू नहीं आए, लेकिन उसके दिल में एक जाति क

े भाव तोड़ दिए गए। उस दिन से गांव में एक नया निय

म बना: अब व्यवस्था विवाह में नाम के बाहर नहीं, ब

ल्कि आत्मा के अंदर जाति के अधिकार का आंकलन किया

जाएगा।

राजू ने अपने दादा के बल्ले को लेकर गांव के मैदान

में खड़ा रहा — और उसके हाथ में एक नया नाम लिखा

गया था: “अर्जुन नहीं, बल्कि राजू”。

वह अब एक नए नाम के साथ जीवन के खेल में आया था।