1947 के नवंबर में, लाहौर के एक टॉयलेट के अंदर, ए
क निशानी के तहत जमा बॉक्स में एक डायरी खोली गई।
उसके चेहरे पर छाया लग रही थी — उसकी बहन का नाम ज
िसका वह कभी उल्लेख नहीं करता था।
उसके पास एक वैज्ञानिक डिवाइस था — 'मेमोरी ल
िंक'
— जो मानव जीवन के तीन जीवनों को एक अवधि में जोड़
सकता था। यह विज्ञान कथा के नियम बदल देता था: अब
व्यक्ति अपने अतीत को बदल सकता था, लेकिन उसके लि
ंग भूमिका को भी चलने लगती थी।
प्रोफेसर अशोक ने इस डिवाइस को बचाने के लिए अपने
बंधु के घर में छुपाया था — लेकिन वह अपने भाई के
व्यापार में शामिल हो गया। व्यापारिक प्रतिद्वंद्व
िता शुरू हुई: एक बैंक ने उनके लोन को रद्द कर दिय
ा, क्योंकि अशोक की लिंग भूमिका "अनिश्चित&qu
ot; हो गई
थी — वह अब एक आदमी नहीं था, न ही एक औरत।
एक रात, उसके घर में आग लगी। बॉक्स जल गया। डायरी
में लिखा था: "मैंने उसका नाम बदल दिया — ताकि वह
बच जाए।"
अशोक ने अपने भाई के सामने खड़े होकर एक बार फिर उ
स नाम को बोला — वह नाम जो 1947 में गायब हो गया थ
ा। उसके आंखों में आग थी — क्रोधित, नहीं, बल्कि ब
हुत गहरे दर्द की आग।
उस दिन बाहर आकाश में आग की लपटें नहीं थीं — लेकि
न उसके दिल में वह लपट जल रही थी। अब वह अपने बंधु
को नहीं बचा सकता था — लेकिन वह उसके नाम को बचा
सकता था।
वह बैंक के दरवाजे पर खड़ा रहा, एक निशानी लगाई —
अब उसका नाम लिखा गया था। अब वह अपने लिंग के बिना
भी एक आदमी था।


