1947 के विभाजन के बाद लाहौर से भारत आए एक गुप्तच

र के बेटे ने खुद को बचाने के लिए जीवन के बारे मे

ं एक नया नियम बनाया: विज्ञान कथा के दौर में इंसा

नों को जीवन के अंश घटाकर निर्धारित किया जाता था

— बायाँ हाथ की उंगली लापता होने पर जीवन का डिजिट

ल डेटा चुनौती में आ जाता था। इसी कारण एक बच्चे क

ो छुड़ाने के लिए उसके पिता ने खुद के बायें हाथ क

ी उंगली काट दी थी। बच्चा बच गया, पिता ने कभी बात

नहीं की।

उसका बेटा, अब 35 साल का, एक सरकारी आवास बनाम आर्

थिक नियमों के बीच फंसा था। वह जानता था कि अगर वह

अपने बायें हाथ की उंगली खो देगा, तो उसका जीवन ड

ेटा ऑटोमैटिक एक बूढ़े व्यक्ति के नाम पर जमा हो ज

ाएगा — और वह खुद को खो देगा। लेकिन उसे एक रात अप

ने पिता के गांव की याद आई — वही जगह जहां विभाजन

के दिन एक नदी में तीन लाशें तैरती थीं।

वह अपने बायें हाथ की उंगली काटने के लिए गांव पहु

ंचा। वहां एक झोपड़ी में एक बूढ़ा आदमी बैठा था —

उसकी उंगलियां लापता थीं। उसने बात नहीं की, लेकिन

अपने बायें हाथ के बांह के निशान को दिखाया — वह

ठीक उसी जगह पर था जहां उसके पिता ने काटी थी।

अगले दिन, उसने अपने बायें हाथ की उंगली काट दी। ड

ेटा बूढ़े आदमी के नाम पर चला गया। लेकिन उसके बाद

जीवन में एक नई बात हुई: उसके अंदर की आवाज, जो क

भी बोलती नहीं थी, अब बोली। उसे याद आया कि उसके प

िता ने कभी नहीं कहा था कि "तुम बचो", ल

ेकिन वह जी

वन दे गया था — अपने बायें हाथ की उंगली के बदले।

वह आखिरी बार गांव की ओर देखा और वापस लौटा। उसके

बायें हाथ की उंगली नहीं थी, लेकिन उसकी आत्मा में

एक नया नियम बस गया: जीवन का माप नहीं उंगलियों स

े, बल्कि वहीं से जो लोग अपने जीवन को दूसरों के ल

िए छोड़ देते हैं।

मौत ने उसे नहीं छुआ, लेकिन विषाद ने उसे जीवित कर

दिया।