गाँव के चौथे झरोखे पर लगी छोटी सी मंदिर की आरती
की आवाज़ में एक आवाज़ बस थी — जो आगे नहीं बढ़ सक
ती थी। उसका नाम था राधिका, 38 साल, गाँव के आंचलि
क विधान के तहत अब तक देवी के नाम से भी बाहर नहीं
निकली थी। उसके पास कोई नौकरी नहीं, कोई डिग्री न
हीं — बस एक मंदिर का काम, जो उसके लिए जीवन बन गय
ा था।
1972 का रेट्रो दौर आ रहा था — दूरदर्शन पर भारतपा
किस्तान क्रिकेट मैच चल रहे थे, घरों में ताले लगे
थे, लेकिन गाँव की आंखें अभी भी अंधेरे में बंधी
थीं। आधुनिकता के नाम पर शहर की ओर जाने का रास्ता
खुल रहा था — लेकिन राधिका के लिए वह रास्ता एक न
िषेध था। उसके ऊपर एक रूढ़ि लागू थी: महिला अगर आं
गन से बाहर निकली तो उसका अंतर्धान हो जाता है — ज
ैसे आग में लाल चिमटा जल जाता है।
लेकिन एक दिन उसे शहर के एक समाचार पत्र के नौकरी
के लिए आवेदन भरने का अवसर मिला। उसके लिए एक नया
विकल्प था — लेकिन उसके लिए एक नियम भी बना था: आउ
टर ऑफ बाउंड ब्लॉगिंग के लिए बाहरी नाम लेना मना ह
ै। उसका नाम राधिका नहीं रह सकता — वह अब "अन
्य" ह
ोनी चाहिए।
एक रात उसने अपनी माँ के सामने बैठकर अपना आवेदन प
त्र लिखा — लेकिन उसने अपना नाम नहीं लिखा। बल्कि
लिखा: “एक मंदिर पुजारी जो जाति के नियमों को तोड़
ने की कोशिश कर रही है”। वह लाइन उसकी आत्मा के बर
ाबर थी — लेकिन गाँव में इसकी धूल नहीं उड़ सकती थ
ी।
अगले दिन गाँव के लोगों ने उसकी लाइन को देखा। उनक
ी आँखें जल उठीं। उन्होंने उसे नहीं बुलाया — बल्क
ि उसके मंदिर के सामने एक आग जलाई। नाम नहीं लिखा
गया, लेकिन उसकी आत्मा को जलाया गया। आग ने उसके प
ुजारी के वस्त्रों को जला दिया, और फिर उसके चेहरे
के ऊपर एक छाया छोड़ गई — जो अब भी उसकी आँखों मे
ं रहती है।
तीन दिन बाद, उसके नाम के बजाय एक बॉक्स में एक अख
बार आया। उसमें एक लेख था — लेखक का नाम नहीं लिखा
था। लेकिन उसकी आवाज़ थी। वह लेख नहीं था — वह एक
जल उठी आत्मा का दस्तावेज़ था।
आग बुझ गई, लेकिन उसके बाद गाँव में कोई मंदिर पुज
ारी नहीं रहा। एक और आवाज़ आई — एक नई धरती पर। रा
धिका अब नहीं रही। लेकिन उसकी लाइन अभी भी दूरदर्श
न पर चल रही है — एक बेनाम आवाज़, जो जाति के रूढ़
ियों के बाहर खड़ी है।


