1946 के अंत में, उत्तरी भारत के एक छोटे से गांव

में, राधिका के पिता को एक रात अपने ही गांव में फ

ांसी दे दी गई—सिर्फ इसलिए कि उन्होंने एक गुप्त ब

च्चे को छिपाने में मदद की थी। गांव के लोगों ने क

हा था: "यह आतंकवाद है।" लेकिन राधिका क

ो पता था—उ

स बच्चे का नाम था अमर, और वह उनके घर में छिपा हु

आ था। वह रात गायब हो गया, और उसके बाद कोई उसके ब

ारे में बात नहीं करता था।

वर्षों बाद, 1972 में, राधिका अब एक स्थानीय पत्रक

ार है—लखनऊ के एक राजभाषा पत्रिका में लिखती है। उ

सके पास एक नई जांच आती है: कोई बच्चा जो 1947 में

विभाजन के दौरान गायब हुआ था, अब एक गुमनाम अपराध

ी के रूप में दिखाई दे रहा है। उसके नाम का एक लेख

छपता है—"अमर जीवित है?" लेकिन अगले दिन

उसके घर

के बाहर एक लाल रंग की डायरी रखी हुई है—उसी बच्चे

की लिखी हुई रात की तारीख, और एक लाइन: "तुम्हारे

लिए चुप्पी अब नहीं बची।"

राधिका को अपने गांव के गुमशुदा बच्चे के बारे में

पता लगता है—वह अमर नहीं था, बल्कि उसके बाद एक अ

लग बच्चा जिसे वही गांव ने गायब कर दिया था। उसकी

मां ने बताया था कि उसे ले जाने के बाद वह एक जाती

य अपराधी समूह में शामिल हो गया था, जिसे लोग कहते

थे “छाया सेना”—एक ऐसी गुप्त बल जिसने विभाजन के

दौरान निर्णय लिए थे, जो अब भी जीवित थे।

राधिका अपने लेखों के जरिए उस अपराध जगत को निशाना

बनाती है। उसके पास एक विशेष नियम है: कोई भी जां

च जो उनके नाम को छूती है, उसे उसके घर में आग लगा

दी जाती है। उसके एक सहयोगी ने एक लेख छापा—और उस

के घर में आग लग गई। राधिका अब जानती है—वह नहीं ब

च सकती, लेकिन अब वह लिखने में भी नहीं रुकेगी।

1973 की एक रात, वह अपने घर में एक अंतिम लेख लिखत

ी है—एक बच्चे की कहानी, जिसे उसके गांव ने गायब क

र दिया था, जिसे एक आत्मखोज के नाम पर फिर से जीवि

त कर दिया जा रहा था। वह लेख को अपने एक पुराने ले

ख के अंत में छुपाती है—जहां एक अधूरा वाक्य है: "

मैं उस बच्चे के बाद नहीं जीती थी... लेकिन अब जी

रही हूं।"

अगली सुबह, उसका घर खाली था। बस एक लाल डायरी बची

थी—जिसके पृष्ठों में एक तारीख लिखी थी: 1947, 15

अगस्त। और उसके नीचे लिखा था: "अब तुम्हारी चुप्पी

का बदला लिया गया है।"

राधिका की लिखी हुई जांच आगे बढ़ी। लेकिन उसका नाम

अब कोई नहीं जानता था।