गाँव के मंदिर की चौथी दीवार फट गई, और वह खड़ा था

रात के बारह बजे, दीपक के धुएँ में देखता रहा जब

उसके हाथ की उँगलियाँ दीवार के टूटे हुए लोहे से छ

ू गईं। गाँव के सामाजिक नियम अब नहीं चलते — ऐतिहा

सिक विभाजन के बाद सरकार ने ग्रामीण इकाइयों को "अ

वैध धरोहर" घोषित कर दिया था, और मंदिरों को बंद क

रने का निर्णय आया। जहाँ पूरे गाँव के लोग उसके चर

णों में आते थे, वहाँ अब बिना आवाज के खाली हवा की

आवाज बजती थी।

अगले दिन एक अफसर आया, उसके हाथ में एक फॉर्म था ज

िस पर लिखा था: "मंदिर के आंतरिक उपयोग को आधुनिक

व्यवस्था से जोड़ना होगा, नहीं तो भूमि राजस्व विभ

ाग निर्माण निरोध लगा देगा।" उसकी आँखों में न तो

भय था, न दया — बस एक जॉब का ड्यूटी बच्चा।

उस रात पुजारी ने अपने गाँव के लोगों को बुलाया, न

हीं बोले, बस एक बात लिखी लकड़ी के तख्ते पर: "अगर

हमने अपनी पूजा बंद कर दी, तो गाँव का आत्मा भी ब

ंद हो जाएगा।" लोगों ने जवाब दिया नहीं, लेकिन तीन

बच्चे उसके पैरों के पास बैठ गए, एक ने दीपक बाँध

ा, दूसरे ने माला लगाई, तीसरे ने झंझट में तिलक लग

ाया।

अगले दिन अफसर आया, लेकिन मंदिर के दरवाजे पर लगे

लाल बैनर पर लिखा था: "इस मंदिर में पूजा के लिए क

ोई आदेश नहीं, बस जीवन की एक आदत।" अफसर ने देखा,

लेकिन नहीं रोका। उसके हाथ में फॉर्म था, लेकिन उस

े छूने में हाथ नहीं लगा।

उसी रात, मंदिर की आखिरी पूजा आयोजित हुई। न कोई ग

ाना, न कोई आग, बस एक बच्चे की आँखों में दीपक की

लौ। उसके बाद जब लोग घर लौटे, तो उनके घरों में अच

ानक बिजली आई। बिजली नहीं, बल्कि एक छोटी सी लौ जै

सी चमक, जो न जाने कहाँ से आई।

अगले दिन अफसर ने फॉर्म वापस लौटा दिया, और लिखा:

"मंदिर बनाए रखा जाएगा।" कोई तारीख नहीं

, कोई कारण

नहीं। लेकिन गाँव के लोग जानते थे — जब तक एक बच्

चा अपने हाथ में दीपक लिए खड़ा रहेगा, तो गाँव की

आत्मा बंद नहीं होगी।