1947 के आसपास के एक काल्पनिक भारत में, जहाँ फिल्

म उद्योग एक नई राष्ट्रीय पहचान बन रहा है, एक महि

ला खेल कोच श्रीमती राजेश्वरी देवी एक छोटे शहर के

खेल मैदान में अपने खिलाड़ियों को तैयार कर रही ह

ैं। वह एक स्वतंत्रता संग्राम के दौर में जीवित रह

े गांधीवादी विचारधारा के प्रतिनिधि हैं, और अपने

खिलाड़ियों को देश के नए रूप के लिए तैयार कर रही

हैं।

फिल्म निर्माता अशोक चौधरी उनके खेल मैदान में एक

नई फिल्म के लिए आता है, जिसमें एक खेल के मैदान प

र विवाह समारोह की घटना शामिल है। इस फिल्म के बजा

य, राजेश्वरी देवी अपने खिलाड़ियों को देश के भावी

आदर्श के लिए तैयार कर रही हैं, जो उनके लिए एक ब

ड़ा झगड़ा बन जाता है।

एक नियम बनता है: खेल मैदान पर विवाह समारोह एक फि

ल्म के लिए बना हुआ है, और इसे बदला नहीं जा सकता।

राजेश्वरी देवी इस नियम के खिलाफ खड़ी हो जाती है

ं, क्योंकि वे इसे एक देश के नए आदर्श के लिए एक न

ए खेल के मैदान के रूप में देखती हैं।

उनका एक खिलाड़ी, जो एक संयुक्त परिवार के भागीदार

है, एक विवाह समारोह में शामिल हो जाता है, जिसमे

ं एक जाति संघर्ष की घटना शामिल है। इस घटना के बा

द, राजेश्वरी देवी खेल मैदान के ऊपर एक विवाह समार

ोह के लिए एक नए आयोजन का आयोजन करती हैं, जिसमें

खेल के मैदान पर एक नई सांस्कृतिक पहचान का निर्मा

ण होता है।

अशोक चौधरी उस फिल्म के बजाय एक नई फिल्म बनाने के

लिए उनके साथ खड़ा हो जाता है, जिसमें खेल के मैद

ान पर एक विवाह समारोह नहीं बल्कि एक खेल के मैदान

पर एक नई राष्ट्रीय पहचान की घटना शामिल है।

राजेश्वरी देवी की नई फिल्म अपने खिलाड़ियों के बी

च एक नई सांस्कृतिक पहचान के रूप में उठती है, जो

एक हास्यपूर्ण दुनिया में एक नए आदर्श के रूप में

अपने स्थान बनाती है।