1983 के दिसंबर में, एक नामहीन छात्र को अपने घर क
े पुराने लकड़ी के बॉक्स में एक फटी हुई किताब मिल
ती है—गांधीजी की आत्मकथा, जिसके अंदर एक चिपकी हु
ई नोटिस थी: "भारत की स्वतंत्रता अब एक किताब के भ
ीतर है।"
अपने गाँव के स्कूल में अंतर्राष्ट्रीय इतिहास की
किताब नहीं थी—लेकिन उस नोट में लिखा था कि 1947 क
े बाद भारत ने विदेशी बैंकों के दायरे से अपने वित
्तीय नियमों को छुड़वा लिया था, और इसके लिए एक गु
प्त लेखा पुस्तक बनाई गई थी—जिसका हर पन्ना एक अंत
र्राष्ट्रीय शर्त को चुनौती देता था।
छात्र के पिता को पता चलता है कि उसके गाँव में ऐत
िहासिक दस्तावेजों को बाहर ले जाना अपराध है—क्यों
कि गाँव के बूढ़े लोग जातिसंघर्ष के बाद विदेशी दस
्तावेजों को बर्बाद करने के आदेश में शामिल थे। उस
की तलाश के कारण परिवार को बाहर निकाल दिया जाता ह
ै।
1986 के दिसंबर में, छात्र दूरदर्शन के एक नामांकि
त कार्यक्रम में अपनी खोज का एक छोटा सा लेख पढ़ता
है—जो आज तक किसी ने नहीं पढ़ा था। उसी रात, उसके
दादा की मां के लिए बनाई गई एक छोटी सी किताब उसक
े हाथ लगती है—जिसमें लिखा था: "इस देश का रहस्य न
हीं, बल्कि इसकी आवाज़ है।"
उसके पास एक बॉक्स था—जिसमें उसने अपने पिता के लि
ए एक नोट लिखा था: "तुमने जो नहीं कहा, वो मैं लिख
रहा हूँ।" वह नोट अब किसी लेखक के हाथ में था—जिस
ने उसे अपनी किताब में शामिल कर लिया था।
अगले दिन, गाँव के झोपड़े के बाहर एक बॉक्स रखा गय
ा था—उसमें एक लिखित पत्र था: "अब तुम्हारा नाम भा
रत की किताब में है।" वहाँ उसकी तस्वीर नहीं थी—ले
किन उसके नाम के नीचे एक नाम था, जो कभी उसके पिता
के नाम से नहीं लिखा गया था।
किताब का अंतिम पन्ना खाली था—लेकिन उस पर एक लकड़
ी के टुकड़े से लिखा गया था: "मैं तुम्हारे बाद आऊ
ँगा।"


