1983 के दिसंबर में, एक फिल्म निर्देशक के घर में
बिजली चली गई। तीन घंटे बाद, उसके बेटे की गाड़ी क
ी लाइटें गाँव के बाहर दिखीं—अज्ञात व्यक्ति ने उस
े बाहर खींच लिया। फिल्म निर्देशक के बालबच्चे के
लिए नहीं, बल्कि उसके आखिरी फिल्म के डायलॉग में छ
िपे एक गाँव के नाम के लिए अपहरण किया गया था।
गाँव की जमीन पर अभी भी विभाजन के दिनों की आग बची
थी। उस दिन की रात जब पुलिस ने उसके बाबा को गिरफ
्तार किया था, तब वह अपने बच्चे को बचाने के लिए ग
ाँव के तालाब में छिपा देता था। आज वही तालाब एक फ
िल्म में शूटिंग के लिए तैयार था।
फिल्म निर्देशक ने बच्चे को ढूंढने के लिए एक चैनल
बंद कर दिया। उसके पास एक टेप था—उसके बच्चे ने 1
975 में दूरदर्शन पर देखी थी एक फिल्म के डायलॉग क
ा रिकॉर्ड। वह डायलॉग था: “मैं तुम्हारे बाबा के ग
ाँव का बच्चा हूँ।” उस दिन की रात गाँव में एक आग
लगी थी, और वह गाँव अब तक नाम से खाली था।
एक जाति के नाम को छुपाने के लिए उसके बाबा ने अपन
े बच्चे को एक अलग नाम दिया था। अब वह नाम फिल्म म
ें आ रहा था—और वह बच्चा जिसके लिए अपहरण हुआ, उसक
ा नाम वही था।
उस रात, उसके घर के पीछे वाले तालाब में एक बच्चे
की छाया तैर रही थी। फिल्म निर्देशक ने एक बैटरी ल
गाई, और उसके हाथ में एक बॉक्स था—उसमें एक टेप और
एक पुरानी तस्वीर थी। वह तस्वीर में उसके बाबा के
साथ एक बच्चा था—वह बच्चा आज अपहरण में लिया गया
था।
उसके घर में एक चैनल बंद था—वह नहीं जानता था कि व
ह अपने बच्चे को बचाने के लिए बंद कर रहा था। लेकि
न जब वह तालाब के किनारे पहुँचा, तो वहाँ एक बच्चा
खड़ा था—उसके हाथ में एक टेप रिकॉर्डर था।
वह रिकॉर्डर चल गया। आवाज आई: “बाबा…
तुम आखिरी फिल्म बनाओगे?”
फिल्म निर्देशक के आँखों में आंसू आए। उसके बच्चे
के पास था वही डायलॉग जो उसने 1980 में लिखा था—जब
उसने अपने बाबा के गाँव के नाम को छुपाने के लिए
उसे नाम बदला था।
वह बच्चे को लेकर घर लौटा। उसके घर के दूरदर्शन ने
एक फिल्म चलाई—उसके बच्चे के लिए एक नाम के साथ।
इस पल के बाद, उसकी फिल्म बनी—“आखिरी फिल्म का दौर
ा”—जिसमें एक बच्चे ने अपने बाबा के गाँव के नाम क
ो बचाया।
और गाँव का नाम अब तक नहीं बदला।


