1946 की शीतल बसंत में दिल्ली के एक पुराने झुग्गी
के किनारे एक धर्मशाला खड़ी थी, जिसकी दीवारें गा
ंधीजी के चित्रों से ढकी हुई थीं। वहाँ के गुरु ने
अपने जीवन का अंत लगभग एक साल पहले एक अक्षरलेखन
वाले आत्महत्या नोट के साथ किया, जिसमें लिखा था:
"मैं अपने लोगों को नहीं छोड़ सकता।"
उनकी मौत के बाद उनके तीन बेटे — एक हिंदू, एक सिख
, और एक मुस्लिम — उनकी संपत्ति के लिए लड़ने लगे।
एक रात, गुरु के बड़े बेटे, जिसे लोग कहते थे "बा
पू", ने अपने नाम के बदले जाति के नाम के लिए आवाज
उठाई। उसने अपने छोटे भाई को बुलाया और कहा: "तुम
्हें नहीं पता था कि वह जो मुस्लिम बच्चा था, वह त
ुम्हारा भाई था?"
साल 1947 की जून की रात, जब भारत का विभाजन तय हो
रहा था, गुरु की विरासत के लिए लड़ाई में एक नया न
ियम आया: जो भी अपने बच्चों के नाम से आवाज उठाएगा
, वह उनके जाति के नाम के लिए भी उत्तरदायी होगा।
उसी रात, बापू ने अपने सिख भाई को बुलाया और कहा:
"अगर तुम अपने नाम के लिए लड़ोगे, तो मैं तुम्हारे
बच्चों के नाम से भी लड़ूंगा।"
उसी रात, बापू ने अपने घर के दरवाजे पर एक तख्ता ल
गाया: "इस घर में कोई जाति नहीं, कोई नाम नहीं — क
ेवल वही जो अपने खून से लड़ेगा।"
अगले दिन, सिख भाई ने अपने बच्चे का नाम बदल दिया
— अब वह "मुस्लिम" नहीं, "अकाली&qu
ot; था। उसकी आंखों म
ें क्रोध नहीं, बल्कि एक ठंडी आशा थी।
जाति के द्वार पर, वह एक आदमी खड़ा था, जिसके पास
कोई नाम नहीं था, लेकिन उसके अंदर जमीन के नाम जीव
ित थे। उसने अपने दादा के बारे में कुछ नहीं लिखा,
लेकिन उसकी जमीन पर एक खेत लगाया — और वहाँ बच्चो
ं के लिए एक फुटबॉल खेलने की जगह बनाई।
वह घर अब भी खड़ा है, जहाँ एक अकेला बापू ने जाति
के द्वार पर आग बुझाई।


