1945 के अंत में, लखनऊ के एक संयुक्त परिवार का खं

डहर था। आदर्श बहू ने चार भाईबहनों के साथ अपने सस

ुराल के दरवाजे पर बालिका के नाम पर दीवार बनाई थी

— लेकिन 1947 के विभाजन में वह घर आग लग गया। उसन

े अपने पति को बचाने के लिए तीन दिन तक अपनी जाति

के नाम को छिपाया — लेकिन रात में उसकी आंखें खुलत

ीं तो वह बैठकर अपने मां के नाम की पुजा करती।

पुरुष के नाम पर बना उसका नाम अब उसके लिए एक चीज

नहीं बल्कि एक जंजीर था। वह दिनरात अपने पति के पर

िवार के लिए बहने लगी — लेकिन जब एक रात उसकी छोटी

बहन ने आग के बीच से अपने मां के नाम का एक चूड़ा

निकाला, तो उसके दिल में वह आग फिर जल उठी।

अगले दिन, वह अपने पति के साथ नहीं, बल्कि अपनी मा

ं के नाम पर यात्रा पर निकल गई — एक ऐसी यात्रा जि

समें दर्शन नहीं, बल्कि दुआ थी। वह अपने घर के दरव

ाजे पर खड़ी रही, उसी जगह जहां उसके दादा की आत्मा

ने एक बार गांधी के नाम पर दावा किया था। उसने अप

नी चादर को आग में फेंक दिया — और अपने बालों को ख

ोलकर खड़ी हो गई।

धार्मिक यात्रा का अनुभव अब एक निशान नहीं बल्कि ए

क ताकत था। उसने अपने मां के नाम पर एक नाम लिखा —

लेकिन वह नाम उसके घर के दरवाजे पर नहीं, बल्कि उ

सके दिल में बस गया।

पुरुष के नाम के बदले, उसने अपने घर को अपनी मां क

े नाम पर बसा लिया। अब जब भी लखनऊ के बाजार में को

ई क्रिकेट के मैच की आवाज सुनता, वह अपने घर के दर

वाजे पर एक छोटी सी पूजा करती — और यात्रा अब खत्म

नहीं हुई, बल्कि वह आगे बढ़ रही थी।

उसके लिए अब जीवन एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि ए

क पौराणिक पुनर्कथन था — जिसका अंत उसके ही नाम पर

लिखा गया था।