1947 के विभाजन के दिन, एक शांत गाँव के निर्माण क
े बाद मंदिर के उपरी गुम्बद में एक गुप्त कमरा खुल
ता है—जिसकी दीवारों पर लगे पुराने फिल्म के टुकड़
े बच्चों की आँखों में जाति के घाव बनकर जीवित होत
े हैं। यह मंदिर अब तक एक पुरानी फिल्म की जगह बना
हुआ है: इसके अंदर कोई फिल्म नहीं बनती—बल्कि फिल
्म के निर्माण के लिए जाति के आधार पर लोगों को नि
र्देशित किया जाता है।
एक संघर्षरत लेखक, जिसकी माँ की आखिरी लाइन उसी मं
दिर के नीचे लिखी गई थी, एक बैकलॉग फिल्म की तैयार
ी में शामिल होता है—जिसका निर्देशन एक गुप्त माफि
या नेता कर रहा है। उसकी योजना: एक ऐसी फिल्म बनान
ा जो विभाजन के दिन जाति के द्वंद्व को दिखाए, लेक
िन उसमें बच्चे जाति के बजाय बंदरों के रूप में दि
खाए जाएँ—इसलिए कि लोग जाति के भावनात्मक घाव को न
हीं देख सकें।
अचानक उसके हाथ में एक पुरानी फिल्म की टेप आती है
—जिसमें एक बच्चा बोलता है: “मैं भी नहीं जानता कि
मैं कौन हूँ।” वह टेप उसके गाँव के बाहर एक बरसात
में बहकर आई थी। उस दिन मंदिर के तीन रखवाले मर ग
ए—उनकी मृत्यु का कारण नहीं बताया गया।
फिल्म की शूटिंग के दौरान एक बच्चा अचानक रोने लगत
ा है—उसके आँखों में तीन बरसात के दिन के झलक दिखत
े हैं। लेखक उसे रोकता है, लेकिन फिल्म बंद हो जात
ी है। अगले दिन उसके लिखे नोट्स गायब हो जाते हैं—
और उसके घर के बाहर एक नई फिल्म की डिस्क रखी होती
है। वह डिस्क खोलता है: उसमें एक दृश्य है जहाँ ए
क बच्चा बोलता है—“मैं भी नहीं जानता कि मैं कौन ह
ूँ”—लेकिन उसकी आवाज़ उसकी माँ की है।
मंदिर के अंदर की दीवारों पर लगी फिल्म के टुकड़े
अचानक जल उठते हैं—लेकिन जलने के बाद उनमें से एक
फिल्म का अंतिम दृश्य बन जाता है: बच्चे बरसात में
खड़े हैं, और उनकी आँखों में जाति का नाम नहीं लि
खा है—बल्कि उनके सिर पर एक नाम का बरसाती चिन्ह ह
ै—“मैं भी नहीं जानता कि मैं कौन हूँ।”
फिल्म बंद हो जाती है। अगले दिन गाँव में बरसात नह
ीं होती—बल्कि धुंध छाई रहती है। लेखक उस मंदिर के
बाहर खड़ा है—और अब उसके चेहरे पर भी एक चिन्ह है
। वह चिन्ह नहीं लिखा है—बल्कि उसके आँखों में जात
ि के नाम के बजाय एक बच्चे की आवाज़ है।
मंदिर के अंदर का ताला अब खुला हुआ है—लेकिन कोई न
हीं अंदर जाता। एक फिल्म का अंत नहीं हुआ—बल्कि एक
नई जिंदगी की शुरुआत हुई है।


