दिल्ली के एक छोटे गांव में जन्मे राहुल, अपने पित
ा के आदर्शों के खिलाफ खड़ा हो जाता है। उसके पिता
एक पारंपरिक धंधा चलाते हैं—मिट्टी के बर्तन बनान
ा, जो इस गांव के लिए एक विशेषता था। लेकिन राहुल
की नजर एक बड़े व्यापार के दिशा में थी, जहां विदे
शी ब्रांडों के बर्तनों की डिमांड बढ़ रही थी।
उसने अपने गांव के बाहर एक छोटा बूचे खोला, जहां उ
सने अपने बर्तनों के बजाय बड़े शहरों में बिकने वा
ले बर्तनों को बनाना शुरू कर दिया। इसके बाद उसके
पिता ने उसे घर से बाहर निकाल दिया, बिना किसी बात
के या अपनी ओर झुके बिना।
गांव के लोग उसके बर्तनों को नहीं खरीदते थे, और श
हर में उसकी बिक्री भी बुरी रहती थी। एक दिन उसे ए
क विदेशी डीलर ने ऑफर किया: उसके बर्तनों के लिए ए
क बड़ा ऑर्डर, लेकिन एक शर्त पर—उसके बर्तनों में
विदेशी तकनीक के साथ बनाने के लिए एक नई मशीन खरीद
नी होगी।
राहुल ने उस ऑर्डर के लिए उस मशीन को खरीद लिया, ल
ेकिन उस मशीन ने उसके गांव के लोगों के बर्तनों के
बनाने के तरीके को बदल दिया। उसके बर्तन अब ठीक न
हीं बनते थे, और गांव के लोग उसे नफरत की नजर से द
ेखने लगे।
एक रात उसने अपने पिता के बर्तनों को जला दिया, एक
बर्तन जो उसके बचपन के एक याद के लिए बना था। उसक
े बर्तनों के धुएं में उसके चेहरे पर अकेलापन दिख
रहा था।
उस दिन से वह अपने गांव में कभी नहीं लौटा, और अब
वह एक विदेश में रहता है, जहां उसके बर्तनों की को
ई जरूरत नहीं है, और उसके गांव की यादें अब एक विष
ाद के रूप में उसके जीवन में बस गई हैं।
उसके बर्तन अब गांव के लोगों के लिए एक याद हैं, औ
र उसकी जीवन कहानी एक प्राचीन शहर के बर्तनों की त
रह अब भी गर्म है, लेकिन अब ठंडा हो रहा है।


