1947 के बाद के एक गाँव में, जहाँ भाषा के फाटक बं
द हो गए थे, एक छोटा सा घर अपने दीवारों में एक त्
योहार छुपाए बैठा था। गाँव के नियम के अनुसार, त्य
ोहार का आयोजन केवल उन्हीं के लिए जो प्राचीन रीति
से शुद्ध रखे गए थे — जिनके लिंग के अनुसार घर के
सामाजिक कार्य निर्धारित थे।
उस गाँव में एक नौकर रहता था — नाम था रामू, लेकिन
वह अपने नाम के साथ एक झूठ ले आया था। उसके पिता
ने उसे एक तरीके से गढ़ा था: "तुम्हें पुरुष बनकर
जीना है।" ऐसे में, उसकी माँ की ओर से बची हुई विर
ासत — एक पुराना लकड़ी का बक्सा — उसके लिए अब निय
म का उल्लंघन था।
अगले साल त्योहार के दिन, गाँव के अधिकारी ने आकर
घर में घुसकर बक्सा ले लिया। नियम के अनुसार, जो भ
ी विरासत लेने वाला उस त्योहार में बचा नहीं रहता,
वह उस त्योहार की रीति को छोड़ देता है। रामू को
बक्सा लेने का अधिकार नहीं था — उसकी माँ के लिंग
के कारण, उसका नाम अभी भी “साहित्य के बाहर” था।
तीन दिन तक रामू ने अपनी छोटी छोटी चीजों को इकट्ठ
ा किया — एक टूटी हुई डायरी, एक लाल रंग का चादर,
और एक चिपचिपी चिट्ठी जिस पर लिखा था: “मेरे बच्चे
के लिए त्योहार नहीं, बल्कि ज़िंदगी का रास्ता चा
हिए।”
वह रात को गाँव के पुराने झरने के पास गया। उसने ब
क्सा खोला — अंदर एक बारीक सी तांबे की घंटी थी, ज
िस पर लिखा था: “यह विरासत की राह बदलती है, जब त्
योहार के बजाय लोगों की ज़िंदगी गिनी जाती है।”
अगले दिन, त्योहार के दिन, रामू ने अपने नाम के सा
थ लिखा एक घोषणा लगाई — नहीं, उसने अपनी आवाज़ नही
ं दी, बल्कि घंटी बजाई। एक बार। उसकी आवाज़ नहीं,
बल्कि वह ध्वनि ने गाँव के नियम को तोड़ दिया।
आठ घंटे के भीतर, गाँव में एक नया रीतिक्रम बना —
अब त्योहार का आयोजन केवल लिंग पर नहीं, बल्कि उस
व्यक्ति की भावनाओं पर होगा, जो अपने घर के बच्चे
के लिए ज़िंदगी का रास्ता बनाने के लिए आगे बढ़ता
है।
बक्सा वापस रामू के पास आया — लेकिन वह उसे नहीं र
खा। वह उसे एक नौजवान लड़के को दे दिया, जिसकी माँ
ने अपने बच्चे के लिए त्योहार नहीं, बल्कि ज़िंदग
ी की अनुमति माँगी थी।
रामू ने अब अपना नाम बदल दिया — अब वह “माँ के बच्
चे” कहलाता था।
और उस गाँव में त्योहार अब नियमों से नहीं, बल्कि
दिल से मनाए जाने लगे।


