1946 की बारिश के दिन गांव के पास आठ साल की लड़की
ने अपने दादाजी के बल्ले को छुआ, जिस पर गांधीजी
के नाम का खुरचा था। उसी दिन उसके पिता ने कांग्रे
स के झंडे के नीचे अपने घर के सामान जला दिए — गां
व में ताल्लुकदारों के अत्याचार के खिलाफ आंदोलन क
े लिए। उस रात गांव के बाजार में एक ड्राइवर की मौ
त हो गई, और उसके हाथ में एक बल्ला था — वही जिसका
नम्बर 17 वाला क्रिकेट बॉल आज भी बरामद किया गया
था।
उस लड़की का नाम रेखा था। 1947 के बाद उसके गांव क
ा नाम बदल गया, लेकिन उसके दिल में वह खाकी का दौर
बना रहा — जब तक उसके भाई को एक नाम लिखे बिना गा
ंव के नेता ने लाश के साथ गांव के मैदान में फेंक
दिया। उसके बाद उसने क्रिकेट के लिए बल्ले को नहीं
छुआ।
1973 में वह लखनऊ के एक जेल में जाती है — वहाँ एक
भ्रष्ट नेता, जिसके चेहरे पर कांग्रेस के चिह्न क
े साथ एक बांटा हुआ आंख का निशान था, उसके सामने ख
ड़ी होती है। उस नेता के पास गांव के उस दिन के वी
डियो थे — जब लड़की के भाई को जाति के नाम पर जलाय
ा गया। उस नेता ने रेखा को एक बोतल दी: "इसे जलाना
है, तो अपने दादाजी के बल्ले के ऊपर लगाओ।"
1982 के दिसंबर में लखनऊ के शहरी वार्ड में एक बार
फिर क्रिकेट मैच होता है — जहाँ दो गांवों के बीच
दुश्मनी बनी हुई है। रेखा वहाँ एक बैंक के कैशियर
के रूप में आती है — लेकिन उसके हाथ में वही बल्ल
ा है, जिस पर गांव के नाम के निशान अब नहीं हैं। म
ैच के दौरान एक गुरुत्वाकर्षण बनता है — जब एक बल्
लेबाज ने जाति के नाम पर गांव के नाम के बारे में
बोला, तो रेखा के दिल में वह बारिश का दिन फिर से
आ जाता है।
उस रात उसके पास एक बोतल आती है — उसमें वही खाकी
का कपड़ा था जिस पर उसके दादाजी ने लिखा था: "हर ए
क बल्ला एक आंदोलन की ध्वनि है।" उस रात उसने जाति
के नेता के घर के सामने एक बल्ले से खाकी का कपड़
ा जला दिया — और उस आग में उसके भाई के नाम के साथ
एक क्रिकेट बॉल भी जल गई।
अगले दिन सुबह लखनऊ के टीवी न्यूज के विज्ञापन में
एक तस्वीर चली — एक लड़की जो बल्ले के साथ जलते क
पड़े के सामने खड़ी है। उस तस्वीर में उसके चेहरे
पर क्रोध की लकीर नहीं थी — बल्कि एक शांति थी, जै
से उसने अपने बल्ले के साथ अपने अतीत को खाकी के र
ूप में जला दिया हो।


