1947 के बर्दाश्त के दिन, लखनऊ के एक जमाने के मका
न में दादी ने एक ताबूत में दस साल की बच्ची के गह
ने दफनाए थे — जिसका नाम अभी तक किसी के लिए नहीं
लिखा गया था। उस बच्ची का नाम अब भी दादी के दिल म
ें बंद था, लेकिन उसके बाहर का दुनिया बदल गई थी:
1950 के बाद से संयुक्त परिवार ने अपने आगे के लिए
अपनी रूढ़ियाँ दुगुनी कर ली थीं, जिसमें लड़के को
अपने घर में रहने का अधिकार नहीं था अगर उसके गां
व की जाति को उच्च रूप से नहीं माना जाता।
उस दादी के घर में अब एक युवा पुरुष रहता था — उसक
े पिता की ओर से एक आश्रित पोता — जिसे बचपन से बत
ाया गया था कि अपने घर में अपने अधिकार के लिए लड़
ना है, लेकिन वह नहीं जानता था कि वह लड़ने वाला व
ास्तविक युद्ध क्या है। उसके घर के तीन दीवारों मे
ं एक निर्माणअनुमति नहीं लेने वाला बाहरी कमरा था
— जो किसी के लिए नहीं दिखता था, लेकिन जब दादी ने
एक रात अपने बर्तन के नीचे छिपा हुआ एक गांठ वाला
ताबूत खोला तो वहाँ से निकली एक चिट्ठी, जिस पर ल
िखा था: “इस घर को अपने आप में नहीं रखो, बल्कि अप
ने लिए बचाओ।”
वह चिट्ठी दादी के अपने बेटे के बारे में थी — जिस
े वह अपने घर में नहीं रख सकती थी, क्योंकि वह एक
राजनीतिक अधिकारी के बेटे थे, और उनकी जाति ने उन्
हें एक ऐसे बिंदु पर लाया था जहाँ उनके बारे में ब
ात करना एक अपराध था। उसके बाद उस बच्ची को एक जात
ि के नाम से दफन कर दिया गया था, लेकिन दादी ने उस
के नाम को अपने घर में जीवित रख लिया था — जैसे कि
वह अपने घर के भीतर एक अपराधी की तरह बस रही हो।
जब पुरुष ने वह चिट्ठी पढ़ी, तो उसे एहसास हुआ कि
उसके अपने लिए भी एक निर्माणअनुमति नहीं है — वह ए
क ‘संयुक्त परिवार’ में रह रहा था, लेकिन उसके लिए
उस परिवार का नियम लागू नहीं होता था। वह निर्माण
अनुमति के बिना अपने लिए एक कमरा बनाना चाहता था —
लेकिन जब उसने दादी के बाहर की दीवार को तोड़ने क
ी कोशिश की, तो वहाँ से एक डाक्यूमेंट निकला जिसमे
ं उसके दादा का नाम था, जो एक अधिकारी थे और जिन्ह
ोंने उसी वर्ष एक जाति के लिए एक गांव को नष्ट करन
े का आदेश दिया था। उस आदेश के बाद उस गांव के लोग
ों को अपने नाम से बाहर निकाल दिया गया था — और दा
दी ने उनमें से एक के बच्चे को अपने घर में छिपा ल
िया था।
उस रात दादी ने अपने घर के बाहर एक बर्तन तोड़ दिय
ा — और उसके अंदर से निकली एक नई चिट्ठी, जिसमें ल
िखा था: “अब तुम्हें भी अपना नाम लिखना होगा।” उसक
े बाद उसने अपने पुराने दीवार के ऊपर लिखा: “हम यह
ाँ नहीं रह सकते, लेकिन हम यहाँ हैं।”
पुरुष ने अपने नाम को अपने कमरे के दरवाजे पर लिखा
— बिना किसी आदेश के, बिना किसी मंजूरी के — और फ
िर उस दिन से उसके घर में एक नई आदत बन गई: जब कोई
नया आदमी आता, तो वह उसे बताता कि यहाँ का नाम अब
उसके लिए है, चाहे वह जाति का बच्चा हो या बेटा ह
ो।
दादी के बाहर की दीवार पर लिखा गया नाम अब उसके बा
हर नहीं रहा था — वह अब उसके भीतर था।


