1947 के जून की रात, लाहौर के एक छोटे से गांव में

रात के आठ बजे बिजली चली गई। चारों ओर अंधेरा छाय

ा, लेकिन दूर एक तिरंगा झंडे के नीचे एक लाल बत्ती

जल रही थी। वहाँ बैठा एक युवा लेखक, जिसका नाम नव

ीन था, अपने पिता के डायरी के पन्नों में लिखे शब्

दों को फिर से देख रहा था—वह एक आम आदमी था, जिसने

1920 के दशक में गांधीवादी आंदोलन में भाग लिया थ

ा, लेकिन आखिरी दिन वह अपने घर में जमीन के ऊपर अप

ने बच्चों के नाम लिखता रहा।

नवीन को अपने दादा के स्मृति के अनुसार उत्तर भारत

के एक गांव में बसने की जरूरत थी। वह बस्ती के बा

हर खड़ा एक अपने नाम का बोर्ड देखता था—“नवीन बाबू

का घर” — लेकिन वहाँ बसा एक और नाम था: “अशोक भाई

का घर”। दोनों नाम एक ही परिवार के थे, लेकिन विभ

ाजन के बाद दो अलगअलग अंग्रेजी नामों में बंटे हुए

थे।

एक अमृतसर जाने वाली ट्रेन के लिए बिल बनाने वाले

दफ्तर में उसे एक अजीब नियम मिला: कोई भी जिसके ना

म में "संयुक्त" शब्द न हो, उसके लिए टि

कट नहीं बन

ती। नवीन के नाम में ऐसा शब्द नहीं था, लेकिन उसके

बाबू के नाम में था—“संयुक्त राम”。

उसने अपने पिता के नाम से टिकट बुक करने की कोशिश

की, लेकिन उस दिन दफ्तर में लिखा था: “संयुक्त नाम

वालों के लिए ही अभी टिकट उपलब्ध हैं। अन्य अनुरो

ध अप्रामाणिक माने जाएंगे।”

नवीन लौट आया, लेकिन रात को गांव के एक बूढ़े दादा

के घर पहुँचा। वह अपने जातीय रिवाज में एक पुराना

घर खोलता हुआ नजर आया—उसके एक तिरंगा झंडे के नीच

े एक छोटी सी तस्वीर थी: दो लड़के, एक गुलाबी कमीज

और दूसरा नीली, एक ही घर के दरवाजे पर खड़े। उस त

स्वीर के पीछे लिखा था: “1938. दो भाई, एक बाप। अब

तक अलग नहीं हुए।”

वह रात नवीन ने अपने डायरी में लिखा: “मैं जानता ह

ूँ कि विभाजन ने भावनाओं को तोड़ा, लेकिन यह भावना

नहीं बल्कि व्यवस्था थी जिसने हमें अलग किया।” उस

ी रात उसके नाम में “संयुक्त” शब्द जोड़ दिया गया—

और अगले दिन टिकट बन गया।

लेकिन उसने अपना नाम बदलने की जरूरत महसूस नहीं की

। उसने अपने नाम के नीचे लिखा: “नवीन संयुक्त बाबू

”। ट्रेन चली, लेकिन उसके दिल में अब एक नई कहानी

थी—जो लिखने वाले के लिए नहीं, बल्कि जीवन के लिए

लिखी जा रही थी।