1970 के दशक के अंत में, गुजरात के एक छोटे से शहर
में, 65 वर्ष की राजकुमारी देवी अपने घर में बैठक
र टेलीविजन देख रही थीं। उनका पोता, राहुल, एक युव
ा सामाजिक कार्यकर्ता था, जो एक बार फिर से लोकल च
ुनाव में उतर रहा था। राजकुमारी के विचार बदले नही
ं थे — उनके लिए परिवार का आधार धर्म, जाति और परं
परा था।
उनके घर में एक नया नियम लागू हो गया था: बिना परि
वार के इजाजत के कोई भी चुनाव नहीं लड़ सकता था। र
ाहुल इस नियम के खिलाफ था। उसके लिए वोट एक अधिकार
था, जो परिवार के नियम से अलग था। एक दिन, राहुल
ने अपनी दादी के सामने एक प्रचार भाषण दिया, जिसमे
ं उसने जातिप्रथा और नए सामाजिक मूल्यों के बीच झग
ड़ा बताया। राजकुमारी ने उसके शब्दों को अपने बर्त
न के ऊपर डाल दिया और कहा, “तुम अपने लोगों की बात
नहीं समझते, बच्चे।”
राहुल ने एक नई रणनीति बनाई — वोट एकत्र करने के ल
िए एक छोटा सा समूह बनाया, जिसमें उसके साथ उसके द
ोस्त और कुछ छात्र शामिल थे। राजकुमारी ने अपने बे
टे और बहू के साथ एक बैठक की, जिसमें उन्होंने अपन
े पोते को चुनाव में नहीं लड़ने के लिए कहा। बेटा
ने उनके आग्रह को अस्वीकृत कर दिया और कहा, “मैं अ
पने बेटे के बराबर हूं, दादी। वो अपने विचारों के
लिए लड़ रहा है।”
चुनाव के दिन, राहुल ने एक छोटे से वाले चुनाव में
जीत हासिल कर ली। राजकुमारी के हाथ में एक टेलीवि
जन रिपोर्ट थी, जिसमें उसके पोते के जीत के बारे म
ें बताया गया था। उन्होंने अपने बेटे के लिए एक छो
टा सा नाच कर दिखाया और कहा, “तुम लोग बहुत बुरे ल
ोग हो।” लेकिन उनकी आंखों में एक छोटा सा हास्य था
— उनके लिए यह एक नया रास्ता था, जो उनकी पीढ़ी क
े अंतर को दिखा रहा था।
उस रात, राजकुमारी ने अपने पोते के साथ एक छोटा सा
भोजन किया। उन्होंने एक छोटा सा परोटा खाया और कह
ा, “अगर तुम जीत गए तो मैं तुम्हारा बर्तन भी धोऊं
गी।” राहुल ने मुस्कुराकर उत्तर दिया, “तो फिर अब
आप भी मेरे चुनाव के लिए बाहर निकलेंगी?” राजकुमार
ी ने अपने हाथ में एक छोटा सा चम्मच रखा और कहा, “
हां, बच्चे। लेकिन इस बार तुम्हारी तरह ही एक बार
फिर नई रास्ते ढूंढूंगी।”
राहुल ने अपने पहले चुनाव के लिए जीत हासिल कर ली,
और राजकुमारी ने अपनी बुढ़ापा की बातों के बीच एक
छोटा सा हास्यपूर्ण रास्ता ढूंढ लिया।


