1947 के बाद के आखिरी दिनों में, लखनऊ के एक अधूरे
विरासत के टूटे गेट के पास एक चादर लहराती थी। वह
हवेली जमीन पर गिरी थी, लेकिन दीवारें अभी भी खड़
ी थीं—अब उनके अंदर दो जातियों का खून रह गया था:
एक कुलीन घराने का बच्चा और एक गुलाम के बेटे का अ
नसुलझा विवाह।
एक महिला प्रोफेसर आई, जिसका नाम अंगीरा था। उसके
पिता के नाम पर उसे हवेली का अधिकार मिला था—लेकिन
उसके पास एक नियम था: कोई भी दो बार इस घर में नह
ीं रह सकता। उस नियम का कारण नहीं बताया गया था—ले
किन जब वह दूसरी बार वापस आई, तो हवेली ने उसकी बा
तें दोहराईं—जैसे कोई बातचीत चल रही हो।
उसने पाया कि इस घर में एक रात के बाद फिर कोई नही
ं जीता था। पिछले 30 वर्षों में तीन लोग गायब हुए—
हर एक के बाद दीवारों पर खून के धब्बे दिखे, लेकिन
जांच में कोई घाव नहीं मिला। नियम की वजह एक रात
के बाद बदल गई थी: जातिगत विवाह के लिए इस हवेली क
ा अधिकार उस जाति के लोगों के बीच ही रहता था—और ज
ब कोई बाहरी आदमी अंदर आता, तो हवेली उसे अपने अंद
र बंद कर लेती।
वह प्रोफेसर ने एक पुरानी डायरी ढूंढी, जिसमें लिख
ा था: "इस घर में अपनी जाति के बाहर किसी के लिए ज
ीना मुमकिन नहीं है।" उसके बाद उसने जाति के रिश्त
े की जांच की—और पाया कि उसकी मां एक वर्गीय नियम
के तहत विवाहित हुई थी, लेकिन उसका नाम कभी लिखा न
हीं गया था।
एक रात, जब उसने एक विद्यार्थी को अंदर बुलाया (एक
गुलाम के बेटे की तरह आवाज़), तो हवेली ने दरवाज़
ा बंद कर लिया। बाहर बरसात हो रही थी। अगली सुबह,
उसकी डायरी में लिखा था: "मैं जीती हूं।"
; लेकिन उस
का चेहरा गुलाम के बेटे की तरह था।
हवेली खाली हो गई। दीवारों पर अब खून के धब्बे नही
ं थे—बल्कि एक नया नाम लिखा हुआ था: "अंगीरा और आद
ित्य, जाति नहीं, प्रेम ने बचाया।"
हवेली आज भी खड़ी है—लेकिन अब उसके अंदर कोई नहीं
रहता। कोई भी दो बार नहीं आता।


