1947 के अगले दिन, लखनऊ के एक छोटे से घर में, नौक

र रामू ने एक तांबे के बर्तन में धूल भरी चावल निक

ाली — उसके अंदर एक छोटा सा वैज्ञानिक उपकरण था, ज

िस पर 'अंतर्राष्ट्रीय संबंध' का निशान

था। जब उसन

े उसे छूआ, तो उसकी आँखों में दुनिया के नक्शे जल

उठे — लेकिन वह देख नहीं सकता था कि इस तरह का उपक

रण किसी भी घर में नहीं रह सकता। भारत के विभाजन क

े बाद जातिघातक विभाजन नहीं, बल्कि वैज्ञानिक विज्

ञान का भागीदार बन गया। अब बड़े शहरों में बिजली न

हीं आती — बल्कि ऊर्जा का आदेश लापता देशों से आता

है।

रामू को अब एक नया अधिकार मिला: वह तीन भाषाओं में

बात कर सकता था, लेकिन उसकी आवाज अभी भी दूर तक न

हीं जाती थी। उसकी मालकिन, डॉ. श्यामा, जिसने अपने

गांव के नाम से उपकरण को रखा था, उसे समझ नहीं आय

ा कि वह अब किसी भी घर के लिए नहीं रह सकती। उसके

पिता ने उपकरण को ले जाने के लिए अफगान भाषी डॉक्ट

र के पास भेजा — लेकिन वह वापस नहीं आया। उसके बाद

रामू को बताया गया कि अब वह किसी भी घर में नहीं

रह सकता — उसका शरीर उपकरण के चुंबकीय रिस्पॉन्स क

े कारण बिजली खींचता है। एक दिन, जब वह लड़के के घ

र में बिजली के बल्ब जला देता है, तो पड़ोस के एक

वृद्ध ने कहा: "इसे निकाल दो, यह अब तुम्हारा नहीं

है।"

अगले दिन, श्यामा ने रामू को एक छोटी सी कार दी —

जिसमें उपकरण का स्थान था। वह जाता था अपने गांव क

े दरवाजे तक, लेकिन वहाँ वह दूर से आवाज सुनता था

— एक अंग्रेजी में बोलता हुआ आदमी कह रहा था: "अब

यह भारत नहीं है, बल्कि एक वैश्विक घर है।" रामू न

े उपकरण को खोला — और अपने बच्चे के नाम से एक लिख

ित पत्र बनाया। वह लिखता था: "तुम्हें मेरे घर में

नहीं आना चाहिए, क्योंकि अब मैं तुम्हारा नहीं हू

ँ।" लेकिन उस पत्र के बाद वह फिर घर आ गया — क्यों

कि उसके बच्चे के बर्थडे पर वह एक अनार लेकर आया थ

ा, जिसे उसने अपने हाथ में रखा था, और जब उसने उसे

खोला, तो उसकी आँखें फिर से दुनिया के नक्शे में

बह गईं।

उस रात, घर में बिजली चली गई — लेकिन रामू के चेहर

े पर एक हंसी थी, जो न तो उसके बच्चे के लिए थी, न

उसकी मालकिन के लिए। वह बस खड़ा था, उपकरण के नीच

े एक बर्तन में चावल रखे हुए, और अब वह जानता था क

ि वह कभी एक नौकर नहीं बनेगा — बल्कि एक ऐसा आदमी,

जिसके बच्चे को भी अपने घर के बाहर का दूसरा घर द

ेना होगा।

आज भी वह लखनऊ के एक छोटे से घर में खड़ा है, चावल

के बर्तन में अपनी छाया देखता है — और हंसता है,

क्योंकि अब वह जानता है कि वरदान वह नहीं है जो तु

म्हें देता है, बल्कि वह है जो तुम्हें बच्चों के

लिए खो देता है।